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कोलकाता बताएगा शब्दों की हजारों साल पुरानी कहानी
कोलकाता। क्या आपने कभी सोचा है कि आज हम जो शब्द रोज़मर्रा की जिंदगी में धड़ल्ले से बोलते हैं, वे एक या दो हजार साल पहले कैसे सुनाई देते थे? उनका मूल रूप क्या था और वक्त के साथ उनके अर्थ और उच्चारण में क्या बदलाव आया? इन सभी रोचक और ऐतिहासिक सवालों के जवाब देने के लिए कोलकाता में देश का पहला भाषा व शब्द संग्रहालय 'म्यूजिय़म ऑफ वर्ड' यानी 'शब्दलोक' बनकर तैयार हो गया है। यह अनोखा संग्रहालय शब्दों की उत्पत्ति, ध्वनि, लिपि और समृद्ध भारतीय सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक तकनीक के संगम के साथ देश के सामने प्रस्तुत करता है।
इस अनूठे और देश के पहले शब्द संग्रहालय 'शब्दलोक' को कोलकाता के राष्ट्रीय पुस्तकालय (नेशनल लाइब्रेरी) परिसर में स्थित ऐतिहासिक बेल्वेडियर हाउस में स्थापित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत की विशाल भाषाई विरासत और भाषा के विकासक्रम को बेहद आधुनिक और इंटरैक्टिव तरीके से आम लोगों, विशेषकर युवा पीढ़ी तक पहुंचाना है। यहाँ आने वाले आगंतुक भाषा के इतिहास को सिर्फ किताबों के पन्नों पर पढ़ेंगे नहीं, बल्कि डिजिटल माध्यमों से उसे लाइव देख, सुन और महसूस भी कर सकेंगे।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना की आधारशिला वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के साथ रखी गई थी। इसके बाद साल 2021 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और पहले चरण में लगभग 14 करोड़ रुपये की लागत से यह भव्य संग्रहालय बनकर तैयार हुआ। इस पूरे प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय पुस्तकालय, संस्कृति मंत्रालय, नेशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूजिय़म्स और ड्रोना संस्था के संयुक्त प्रयासों से मूर्त रूप दिया गया है, जिसका उद्घाटन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किया।
संग्रहालय के भीतर कुल 9 थीम आधारित गैलरी बनाई गई हैं, जो बिना किसी रुकावट के एक मुकम्मल सफर की तरह हैं। इनमें आदि शब्द, मातृभाषा, भाषा का विकास, मौखिक परंपरा, महापुरुषों का भाषाई योगदान, परफॉर्मिंग आर्ट्स, सार्वभौमिक संवाद, सार्वजनिक पुस्तकालयों का इतिहास और शब्द-संस्कृति से जुड़ी विशेष प्रदर्शनियां शामिल हैं। 'शब्दलोक' का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी ऑडियो-विजुअल तकनीक है, जो किसी भी शब्द की हजारों वर्षों की यात्रा को लाइव ऑडियो के जरिए सुनाती है कि सदियों पहले उसका उच्चारण कैसा था।
इसके अलावा, संग्रहालय में भारत की भाषाई विरासत से जुड़ी कई दुर्लभ वस्तुएं भी संजोकर रखी गई हैं। आगंतुक यहाँ ब्राह्मी और पाली जैसी प्राचीन लिपियां, ऐतिहासिक पांडुलिपियां, ताम्रपत्र, पुराने सिक्के और छपाई कला के इतिहास को देख सकते हैं। साथ ही बंगाल की संस्कृति को दर्शाने वाला पुरुलिया का प्रसिद्ध छाऊ मुखौटा, उत्तर बंगाल का गम्भीरा मुखौटा और समृद्ध आदिवासी कला-संस्कृति भी यहाँ डिजिटल डिस्प्ले और इंटरैक्टिव इंस्टॉलेशन के जरिए प्रदर्शित की गई है। फिलहाल पहले चरण में भारतीय संविधान की 22 अनुसूचित भाषाओं का इतिहास और ध्वन्यात्मक विकास शामिल किया गया है, जबकि भविष्य में अन्य भारतीय व क्षेत्रीय आदिवासी भाषाओं को भी इस संग्रहालय का हिस्सा बनाया जाएगा।